सुंदरकाण्ड

दूत का रावण को समझाना और लक्ष्मणजी का पत्र देना

दोहा – 53

 की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ।। 53 ।।

भावार्थः- उनसे तेरी भेट हुई या वे कानो से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए ? शत्रु सेना का तेज और बल बताता क्यो नही ? तेरा चित्त बहुत ही चकित ( भौचक्का सा ) हो रहा है ।। 53 ।।

चौपाई – 

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा ।। 1 ।।

भावार्थः-  ( दूत ने कहा – ) हे नाथ ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए ( मेरी बात पर विश्र्वास कीजिए ) । जब आपका छोटा भाई श्री राम जी से जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्री राम जी ने उसको राज तिलक कर दिया ।। 1 ।।

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ।। 2 ।।

भावार्थः- हम रावण के दूत है , यह कानो से सुनकर वानरो ने हमे बाँधकर बहुत कष्ट दिए , यहाँ तक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे । श्री राम जी की शपथ दिलाने पर कही उन्होने हमको छोड़ा ।। 2 ।।

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी ।। 3 ।।

भावार्थः- हे नाथ! आपने श्री राम जी की सेना पूछी, सो वह तो सौ करोड़ मुखो से भी वर्णन नही की जा सकती।अनेको रंगो के भालु और वानरो की सेना है, जो भयंकर मुख वाले , विशाल शरीर वाले और भयानक है ।।3।।

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला ।। 4 ।।

भावार्थः- जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा , उसका बल तो सब वानरो मे थोड़ा है। असंख्य नामो वाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा है। उनमे असंख्य हाथियो का बल है और वे बड़े ही विशाल है।। 4 ।।

दोहा – 54

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ।। 54 ।।

भावार्थः- द्विविद, मयंद , नील , अंगद , गद , विकटास्य , दधिमुख, केसरी , निशठ, शठ और जाम्बवान् ये सभी भल की राशि है ।। 54 ।।

चौपाई – 

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं ।। 1 ।।

भावार्थः- ये सब वानर बल मे सुग्रीव के समान है और इनके जैसे ( एक-दो नही ) करोड़ो है , उन बहुत सो को गिन ही कौन सकता है । श्री राम जी की कृपा से उनमे अतुलनीय बल है । वे तीनो लोको को तृण के समान तुच्छ समझते है ।। 1 ।।

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ।। 2 ।।

भावार्थः-हे दसग्रीव ! मैने कानो से ऐसा सुना है कि अठारह पद्द तो अकेले वानरो के सेनापति है । हे नाथ ! उस सेना मे ऐसा कोई वानर नही है, जो आपको रण मे न जीत सके ।। 2 ।।

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ।। 3 ।।

भावार्थः- सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मीजते है । पर श्री रघुनाथ जी उन्हे आज्ञा नही देते । हम मछलियो और साँपो सहित समुन्द्र को सोख लेंगे । नही तो बड़े-बड़े पर्वतो से उसे भरकर पूर ( पाट ) देंगे ।। 3 ।।

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका ।। 4 ।।

भावार्थः- और रावण को मसलकर धूल मे मिला देंगे । सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे है । सब सहज ही निडर है, इस प्रकार गरजते और डपटते है मानो लंका को निगल ही जाना चाहते है ।। 4 ।।

दोहा – 55

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम ।। 55 ।।

भावार्थः- सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर है फिर उनके सिर पर प्रभु ( सर्वेश्र्वर ) श्री राम जी है । हे रावण ! वे संग्राम मे करोड़ो कालो को जीत सकते है ।। 55 ।।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई ।।

सक सर एक सोषि सत सागर । तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ।। 1 ।।

भावार्थः- श्री राम चन्द्र जी के तेज , बल और बुद्धि की अधिकता को लाखो शेष भी नही गा सकते । वे एक ही बाण से सैकड़ो समुद्रो को सोख सकते है, परन्तु नीति निपुण श्री राम जी ने ( नीति की रक्षा के लिए ) आपके भाई से उपाय पूछा ।। 1 ।।

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं

सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा ।। 2 ।।

भावार्थः-उनके ( आपके भाई के ) वचन सुनकर वे ( श्री राम जी ) समुन्द्र से राह माँग रहे है, उनके मन मे कृपा भी है ( इसलिए वे उसे सोखते नही ) दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा ( और बोला – ) जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरो को सहायक बनाया है ।। 2 ।।

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई

मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ।। 3 ।।

भावार्थः-स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होने समुद्र से मचलना ( बालहठ ) ठाना है । अरे मूर्ख ! झूठी बड़ाई क्या करता है ? बस, मैने शत्रु ( राम ) के बल और बुद्धि की थाह पा ली ।। 3 ।।

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ।।

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी ।। 4 ।।

भावार्थः- जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगतमें विजय और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ? दुष्ट रावणके वचन सुनकर दूतको क्रोध बढ़ आया| उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली||4||

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ।।

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन ।। 5 ।।

भावार्थः-  (और कहा)– श्री राम जी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है । हे नाथ ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिए । रावण वे हँसकर उसे बाएँ हाथ से लिया और मंत्री को बुलवाकर वह मूर्ख उसे बचाने लगा ।। 5 ।।

दोहा – 56

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ।। 56(क) ।।

भावार्थः– ( पत्रिका मे लिखा था- ) अरे मूर्ख ! केवल बातो से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-नष्ट न कर । श्री राम जी से विरोध करके तू विष्णु , ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नही बचेगा ।। 56 क ।।

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग  ।। 56(ख) ।।

भावार्थः– या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण कमलो का भ्रमर बन जा । अथवा रे दुष्ट ! श्री राम जी के बाण रूपी अग्नि मे परिवान सहित पतिंगा हो जा ( दोनो मे से जो अच्छा लगे सो कर ) ।। 56 ख ।।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा ।। 1 ।।

भावार्थः- पत्रिका सुनते ही रावण मन मे भयभीत हो गया, परन्तु मुख से ( ऊपर से ) मुस्कुराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा – जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता है, वैसे ही यह छोटा तपस्वी ( लक्ष्मण ) वाग्विलास करता है ( डींग हाँकता है ) ।। 1 ।।

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ।। 2 ।।

भावार्थः-शुक ( दूत ) ने कहा – हे नाथ ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर ( इस पत्र मे लिखी ) सब बातो को सत्य समझिए । क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए । हे नाथ ! श्री राम जी से वैर त्याग दीजिए ।। 2 ।।

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही ।। 3 ।।

भावार्थः-यद्यपि श्री रघुवीर समस्त लोको के स्वामी है, पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है । मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय मे नही रखेंगे ।। 3 ।।

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ।। 4 ।।

भावार्थः- जानकी जी श्री रघुनाथ जी को दे दीजिए । हे प्रभु ! इतना कहना मेरा कीजिए । जब उस ( दूत ) ने जानकी जी को देने के लिए कहा , तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी ।। 4 ।।

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई ।। 5 ।।

भावार्थः-वह भी ( विभीषण की भाँति ) चरणो मे सिर नवाकर नही चला , जहाँ कृपासागर श्री रघुनाथ जी थे । प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री राम जी की कृपा से अपनी गति ( मुनि का स्वरूप) पाई ।। 5 ।।

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ।। 6 ।।

भावार्थः- ( शिवाजी कहते है ) – हे भवानी ! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप के राक्षस हो गया था । बार-बार श्री राम जी के चरणो की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया ।। 6 ।।

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