सुंदरकाण्ड

चौपाई –

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा ।। 1 ।।

भावार्थः- वहाँ ( लंका मे ) जब से हनुमान् जी लंका को जलाकर गए, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे । अपने-अपने घरो मे सब विचार करते है कि अब राक्षस कुल की रक्षा ( का कोई उपाय ) नही है ।। 1 ।।

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।

दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी ।। 2 ।।

भावार्थः जिससे दूत का बल वर्णन नही किया जा सकता , उसके स्वयं नगर मे आने पर कौन भलाई है (हम लोगो की बड़ी बुरी दशा होगी) दूतियो से नगरवासियो के वचन सुनकर मंदोदरी बहुत ही व्याकुल हो गई ।। 2 ।।

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु ।। 3 ।।

भावार्थः- वह एकांत मे हाथ जोड़कर पति (रावण)  के चरणो मे लगी और नीतिरस मे पगी हुई वाणी बोली–हे प्रियतम! श्री हरि से विरोध छोड़ दीजिए| मेरे कहने को अत्यंत ही हितकर जानकर ह्रदय मे धारण कीजिए ।।3।।

समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।

तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई ।। 4 ।।

भावार्थः-जिनके दूत की करनी का विचार करते ही राक्षसो की स्त्रियो के गर्भ गिर जाते है, हे प्यारे स्वामी ! यदि भला चाहते है, तो अपने मंत्री को बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्री को भेज दीजिए ।। 4 ।।

तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।

सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ।। 5 ।।

भावार्थः- सीता आपके कुल रूपी कमलो के वन को दुःख देने वाली जाड़े की रात्रि के समान आई है । हे नाथ ! सुनिए, सीता को दिए ( लौटाए ) बिना शम्भु और ब्रह्मा के किए भी आपका भला नही हो सकता ।। 5 ।।

दोहा – 36

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ।। 36 ।।

भावार्थः- श्री रामजी के बाण सर्पो के समूह के समान है और राक्षसो के समूह मेढक के समान । जब तक वे इन्हे ग्रस नही लेते ( निगल नही जाते ) तब तक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिए ।। 36 ।।

चौपाई –

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा ।। 1 ।।

भावार्थः- मूर्ख और जगत प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानो से उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा ( और बोला – ) स्त्रियो का स्वभा सचमुच ही बहुत डरपोक होता है । मंगल मे भी भय करती हो । तुम्हारा मन ( ह्रदय ) बहुत ही कच्चा ( कमजोर ) है ।। 1 ।।

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।

कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा ।। 2 ।।

भावार्थः- यदि वानरो की सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवन निर्वाह करेंगे । लोकपाल भी जिसके डर से काँपते है, उसकी स्त्री डरती हो , यह बड़ी हँसी की बात है ।। 2 ।।

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ।। 3 ।।

भावार्थः- रावण ने ऐसा कहकर हँसकर उसे ह्रदय से लगा लिया और ममता बढ़ाकर ( अधिक स्नेह दर्शाकर ) वह सभा मे चला गया । मंदोदरी ह्दय मे चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता प्रतिकूल हो गए ।। 3 ।।

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।

बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ।। 4 ।।

भावार्थः- ज्यों ही वह सभा मे जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पाई कि शत्रु की सारी सेना समुन्द्र के उस पार आ गई है, उसने मंत्रियो से पूछा कि उचित सलाह कहिए ( अब क्या करना चाहिए ? ) तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किए रहिए ( इसमे सलाह की कौन सी बात है ? ) ।। 4 ।।

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही ।। 5 ।।

भावार्थः- आपने देवताओ और राक्षसो को जीत लिया , तब तो कुछ श्रम ही नही हुआ । फिर मनुष्य और वानर किस गिनती मे है ? ।। 5 ।।

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