सुंदरकाण्ड

विभीषण का भगवान्‌ श्री रामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरण प्राप्ति

दोहा – 41

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।। 41 ।।

भावार्थः- श्री रामजी संकल्प एवं  ( सर्वसमर्थ ) प्रभु है और ( हे रावण ) तुम्हारी सभा काल के वश है । अतः मै अब श्री रघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना ।। 41 ।।

चौपाई –

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ।। 1 ।।

भावार्थः- ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यो ही चले , त्यो ही सब राक्षस आयुहीन हो गए । ( उनकी मृत्यु निश्र्चित हो गई ) । ( शिवजी कहते है – ) हे भवानी ! साधु का अपमान तुरन्त ही संपूर्ण कल्याण की हानि ( नाश ) कर देता है ।। 1 ।।

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं ।। 2 ।।

भावार्थः- रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा , उसी क्षण वह अभागा वैभव ( ऐश्र्वर्य ) से हीन हो गया । विभीषण जी हर्षित होकर मन मे अनेको मनोरथ करते हुए श्री रघुनाथ जी के पास चले ।। 2 ।।

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी ।। 3 ।।

भावार्थः- ( वे सोचते जाते थे – ) मै जाकर भगवान् के कोमल और लाल वर्ण के सुन्दर चरण कमलो के दर्शन करूँगा , जो सेवको को सुख देने वाले है, जिन चरणो का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी अहल्या तर गई और जो दंडकवन को पवित्र करने वाले है ।। 3 ।।

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई ।। 4 ।।

भावार्थः- जिन चरणो को जानकी जी ने हृदय मे धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर ( उसे पकड़ने को ) दौड़ थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजी के हृदय रूपी सरोवर मे विराजते है, मेरा अहोभाग्य है कि उन्ही को आज मै देखूँगा ।। 4 ।।

दोहा – 42

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ।। 42 ।।

भावार्थः- जिन चरणो की पादुकाओ मे भरत जी ने अपना मन लगा रखा है , अहा ! आज मै उन्ही चरणो को अभी जाकर इन नेत्रो से देखूँगा ।। 42 ।।

चौपाई –

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ।। 1 ।।

भावार्थः- इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुन्द्र के इस पार ( जिधर श्री रामचन्द्र जी की सेना थी ) आ गए । वानरो ने विभीषण को आते देखा तो उन्होने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है ।। 1 ।।

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई ।। 2 ।।

भावार्थः-उन्हे ( पहरे पर ) ठहराकर वे सुग्रीव के पास आए और उनको सब समाचार कह सुनाए । सुग्रीव ने ( श्री राम जी के पास जाकर ) कहा – हे रघुनाथ जी ! सुनिए , रावण का भाई ( आप से ) मिलने आया है ।। 2 ।।

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया ।। 3 ।।

भावार्थः- प्रभु श्री राम जी ने कहा – हे मित्र ! तुम क्या समझते हो ( तुम्हारी क्या राय है ) ? वानरराज सुग्रीव ने कहा – हे महाराज ! सुनिए , राक्षसो की माया जानी नही जाती । यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है ।। 3 ।।

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी ।। 4 ।।

भावार्थः-( जान पड़ता है ) यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस बाँध रखा जाए । ( श्री राम जी ने कहा – ) हे मित्र ! तुमने नीति तो अच्छी विचारी , परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना ।। 4 ।।

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना ।। 5 ।।

भावार्थः- प्रभु के वचन सुनकर हनुमान् जी हर्षित हुए ( और मन ही मन कहने लगे कि ) भगवान् कैसे शरणागतवत्सल ( शरण मे आए हुए पर पिता की भाँति प्रेम करने वाले ) है ।। 5 ।।

दोहा – 43

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।। 43 ।।

भावार्थः- ( श्री राम जी फिर बोले – ) जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण मे आए हुए का त्याग कर रहे है , वे पामर ( क्षुद्र ) है , पापमय है, उन्हे देखने मे भी हानि है ( पाप लगता है ) ।। 43 ।।

चौपाई –

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।। 1 ।।

भावार्थः- जिसे करोड़ो ब्राह्मणो की हत्या लगी हो, शरण मे आने पर मै उसे भी नही त्यागता । जीव ज्यो ही मेरे सम्मुख होता है, त्यो ही उसको करोड़ो जन्मो के पाप नष्ट हो जाते है ।। 1 ।।

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई ।। 2 ।।

भावार्थः- पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नही सुहाता । यदि वह ( रावण का भाई ) निश्र्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था ? ।। 2 ।।

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा  ।। 3 ।।

भावार्थः- जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है । मुझे कपट और छल-छिद्र नही सुहाते । यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है , तब भी हे सुग्रीव । अपने को कुछ भी भय या हानि नही है ।। 3 ।।

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई ।।  4 ।।

भावार्थः-क्योकि हे सखे ! जगत मे जितने भी राक्षस है , लक्ष्मण क्षणभर मे उन सबको मार सकते है और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण आया है तो मै तो उसे प्राणो की तरह रखूँगा ।। 4 ।।

दोहा -44

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ।। 44 ।।

भावार्थः- कृपा के धाम श्री राम जी ने हँसकर कहा – दोनो ही स्थितियो मे उसे ले आओ । तब अंगद और हनुमान् सहित सुग्रीव जी कपालु श्री राम जी की जय हो , कहते हुए चले ।। 44 ।।

चौपाई –

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता ।। 1 ।।

भावार्थः- विभीषणजी को आदर सहित आगे करक वानर फिर वहाँ चले , जहाँ करूणा की खान श्री रघुनाथ जी ने । नेत्रो को आनन्द का दान देने वाले ( अत्यंत सुखद ) दोनो भाइयो को विभीषण जी ने दूर ही देखा ।। 1 ।।

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ।। 2 ।।

भावार्थः- फिर शोभा के धाम श्री राम जी को देखकर वे पलक ( मारना ) रोककर ठिठककर ( स्तब्ध होकर ) एकटक देखते ही रह गए । भगवान् की विशाल भुजाएँ है लाल कमल के समान नेत्र है और शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर है ।। 2 ।।

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ।। 3 ।।

भावार्थः- सिंह के से कंधे है , विशाल वक्षः स्थल ( चौड़ी छाती ) अत्यंत शोभा दे रहा है । असंख्य कामदेवो के मन को मोहित करने वाला मुख है । भगवान् के स्वरूप को देखकर विभीषण जी के नेत्रो मे जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया । फिर मन मे धीरज धरकर उन्होने कोमल वचन कहे ।। 3 ।।

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ।। 4 ।।

भावार्थः- हे नाथ ! मै दशमुख रावण का भाई हूँ । हे देवताओ के रक्षक ! मेरा जन्म राक्षस कुल मे हुआ है । मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है ।। 4 ।।

दोहा – 45

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।। 45 ।।

भावार्थः- मै कानो से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव ( जन्म-मरण ) के भय का नाश करने वाले है ! हे दुखियो के दुःख दूर करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्री रघुवीर ! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए ।। 45 ।।

चौपाई –

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ।। 1 ।।

भावार्थः- प्रभु ने उन्हे ऐसा कहकर दंडवत् करते देखा तो वे अत्यंत हर्षित होकर तुरन्त उठे । विभीषणजी के दीन वचन सुनने पर प्रभु के मन को बहुत ही भाए । उन्होने अपनी विशाल भुजाओ से पकड़कर उनको ह्दय से लगा लिया ।। 1 ।।

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ।। 2 ।।

भावार्थः- छोटे भाई लक्ष्मण जी सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्री राम जी भक्तो के भय को हरने वाले वचन बोले – हे लंकेश ! परिवार सहित अपनी कुशल कहो । तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है ।। 2 ।।

खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती ।। 3 ।।

भावार्थः- दिन-रात दुष्टो की मंडली मे बसते हो । ( ऐसी दशा मे ) हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है ? मै तुम्हारी सब रीति ( आचार-व्यवहार ) जानता हूँ । तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, तुम्हे अनीति नही सुहाती ।। 3 ।।

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ।। 4 ।।

भावार्थः- हे तात ! नरक मे रहना वरन् अच्छा है , परन्तु विधाता दुष्ट का संग ( कभी ) न दे । ( विभीषण जी ने कहा – ) हे रघुनाथ जी ! अब आपके चरणो का दर्शन कर कुशल से हूँ , जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है ।। 4 ।।

दोहा – 46

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।। 46 ।।

भावार्थः- तब तक जीन की कुशल नही और न स्वप्न मे भी उसके मन को शान्ति है , जब तक वह शोक के घर काम ( विषय – कामना ) को छोड़कर श्री राम जी को नही भजता ।। 46 ।।

चौपाई –

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा ।। 1 ।।

भावार्थः- लोभ , मोह , मत्सर ( डाह ) , मद और मान आदि अनेको दुष्ट तभी तक हृदय मे बसते है, जब तक कि धनुष-बाण और कमर मे तरकस धारम किए हुए श्री रघुनाथ जी हृदय मे नही बसते ।। 1 ।।

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ।। 2 ।।

भावार्थः-ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओ को सुख देने वाली है । वह ( ममता रूपी रात्रि ) तभी तक जीव के मन मे बसती है , जब प्रभु ( आप ) का प्रताप रूपी सूर्य उदय नही होता ।। 2 ।।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ।। 3 ।।

भावार्थः- हे श्री राम जी ! आपके चरणारविन्द के दर्शन कर अब मै कुशल से हूँ , मेरे भारी भय मिट गए । हे कृपालु ! आप जिस पर अनुकूल होते है, उसे तीनो प्रकार के भवशूल ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप ) ही व्यापते ।। 3 ।।

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ।। 4 ।।

भावार्थः-मै अत्यंत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ । मैने कभी शुभ आचरण नही किया । जिनका रूप मुनियो के भी ध्यान मे नही आता, उन प्रभु ने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया ।। 4 ।।

दोहा – 47

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ।। 47 ।।

भावार्थः- हे कृपा और सुख के पुंज श्री रामजी ! मेरा अत्यंत असीम सौभाग्य है, जो मैने ब्रह्मा और शिवजी के द्वारा सेवित युगल चरण कमलो को अपने नेत्रो से देखा ।। 47 ।।

चौपाई –

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ।।

जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही ।। 1 ।।

भावार्थः- ( श्री राम जी ने कहा – ) हे सखा ! सुनो, मै तुम्हे अपना स्वभाव कहता हूँ , जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वती जी भी जानती है । कोई मनुष्य ( संपूर्ण ) ज़ड़ –चेतन जगत् का द्रोही हो , यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तक आ जाए ।। 1 ।।

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ।। 2 ।।

भावार्थः- और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याद दे तो मै उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ । माता-पिता , भाई ,पुत्र , स्त्री , शरीर , धन , घर , मित्र और परिवार ।। 2 ।।

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।। 3 ।।

भावार्थः- इस सबको ममत्व रूपी तागो को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणो मे बाँध देता है । ( सारे सांसारिक संबंधो का केन्द्र मुझे बना लेता है ) जो समद्रशी है , जिसे कुछ इच्छा नही है और जिसके मन मे हर्ष , शोक और भय नही है ।। 3 ।।

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।। 4 ।।

भावार्थः-ऐसा सज्जन मेरे हृदय मे केसे बसता है, जैसे लोभी के हृदय मे धन बसा करता है । तुम सरीखे संत ही मुझे प्रिय है । मै और किसी के निहोरे से ( कृतज्ञतावश ) देह धारण नही करता ।। 4 ।।

दोहा – 48

 सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।। 48 ।।

भावार्थः- जो सगुण ( साकार ) भगवान् के उपासक है, दूसरे के हित मे लगे रहते है, नीति और नियमो मे दृढ़ है और जिन्हे ब्राह्मणो के चरणो मे प्रेम है , वे मनुष्य मेरे प्राणो के समान है ।। 48 ।।

चौपाई – 

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।। 1 ।।

भावार्थः- हे लंकापति ! सुनो , तुम्हारे अन्दर उपर्युक्त सब गुण है । इससे तुम मुझे अत्यंत ही प्रिय हो । श्री रामजी के वचन सुनकर सब वानरो के समूह कहने लगे – कृपा के समूह श्री राम जी की जय हो ।। 1 ।।

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ।। 2 ।।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

भावार्थः- प्रभु की वाणी सुनते है और उसे कानो के लिए अमृत जानकर विभीषण जी अघाते नही है । वे बार-बार श्री राम जी के चरण कमलो को पकड़ते है अपार प्रेम है , हृदय मे समाता नही है ।। 2 ।।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ।। 3 ।।

भावार्थः- ( विभीषण जी ने कहा – ) हे देव ! हे चराचर जगत् के स्वामी ! हे शरणागत के रक्षक ! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले । सुनिए , मेरे हृदय मे पहले कुछ वासना थी । वह प्रभु के चरणो की प्रीति रूपी नदी मे बह गई ।। 3 ।।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा ।। 4 ।।

भावार्थः- अब तो हे कृपालु ! शिवजी के मन को सदैव प्रिय लगने वाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिए । “ एवमस्तु ” ( ऐसा ही हो ) कहकर रणधीर प्रभु श्री राम जी ने तुरन्त ही समुन्द्र का जल माँगा ।। 4 ।।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ।। 5 ।।

भावार्थः-(और कहा–) हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नही है, पर जगत् मे मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नही जाता) ऐसा कहकर श्री राम जी ने उनको राज तिलक कर दिया।आकाश से पुष्पो की अपार वृष्टि हुई ।। 5 ।।

दोहा – 49

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

भावार्थः- श्री राम जी ने रावण की क्रोध रूपी अग्नि मे, जो अपनी ( विभीषण की ) श्र्वास ( वचन ) रूपी पवन से प्रचन्ड हो रही थी , जलते हुए विभीषण को बचा लिया और उसे अखंड राज्य दिया ।। 49 क ।।

 

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

भावार्थः- शिवजी ने जो संपत्ति रावण को दसो सिरो की बलि देने पर दी थी , वही संपत्ति श्री रघुनाथ जी ने विभीषण को बहुत सकुचते हुए दी ।। 49 ख ।।

चौपाई  –

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ।। 1 ।।

भावार्थः- ऐसे परम कृपालु प्रभु को छोड़कर जो मनुष्य दूसरे को भजते है , वे बिना सींग-पूँछ के पशु है । अपना सेवक जानकर विभीषण को श्री राम जी ने अपना लिया । प्रभु का स्वभाव वानरकुल के मन को ( बहुत ) भाया ।। 1 ।।

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहि त उदासी।।

बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक  ।। 2 ।।

भावार्थः- फिर सब कुछ जानने वाले , सबके हृदय मे बसने वाले, सर्वरूप ( सब रूपो मे प्रकट ), सबसे रहित, उदासीन, कारण से ( भक्तो पर कृपा करने के लिए ) मनुष्य बने हुए तथा राक्षसो के कुल का नाश करने वाले श्री राम जी नीति की रक्षा करने वाले वचन बोले ।। 2 ।।

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