सुंदरकाण्ड

हनुमान्‌जी का अशोक वाटिका में सीताजी को देखकर दुःखी होना और रावण का सीताजी को भय दिखलाना

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई ।।

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ ।। 3 ।।

भावार्थः- विभीषणजी ने ( माता के दर्शन की ) सब युक्तियाँ ( उपाय ) कह सुनाई । तब हनुमान् जी विदा लेकर चले । फिर वही ( पहले का मसक सरीखा ) रूप धरकर वहाँ गए, जहाँ अशोक वन मे ( वन के जिस भाग मे ) सीताजी रहती थी ।। 3 ।।

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ।। 4 ।।

भावार्थः- सीताजी को देखकर हनुमान् जी ने उन्हे मन ही मे प्रणाम किया । उन्हे बैठे ही बैठे रात्रि के चारो पहर बीत जाते है । शरीर दबुला हो गया है , सिर पर जटाओ की एक वेणी ( लट ) है । हृदय मे श्री रघुनाथ जी के गुण समूहो का जाप ( स्मरण ) करती रहती है  ।। 4 ।।

दोहा – 8

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ।।8।।

भावार्थः- श्री जानकी जी नेत्रो को अपने चरणो मे लगाए हुए है (नीचे की ओर देख रही है) और मन श्री राम जी के चरण कमलो मे लीन है ।जानकी जी को दीन (दुःख) देखकर पवनपुत्र हनुमान् जी बहुत ही दुःखी हुए ।।8।।

चौपाई –

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा ।। 1 ।।

भावार्थः- हनुमान् जी वृक्ष के पत्तो मे छिप रहे और विचार करने गले कि हे भाई ! क्या करूँ ( इनका दुःख कैसे  दूर करूँ ) ? उसी समय बहुत सी स्त्रियो को साथ लिए सज-धजकर रावण वहाँ आया ।। 1 ।।

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी ।। 2 ।।

भावार्थः- उस दुष्ट ने सीता जी को बहुत प्रकार से समझाया । साम, दाम, भय और भेद दिखलाया । रावण ने कहा – हे सुमुखि ! सुनो ! मंदोदरी आदि सब रानियो को ।। 2 ।।

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही ।। 3 ।।

भावार्थः- मै तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है । तुम एक बार मेरी ओर देखो तो सही ! अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्री रामचन्द्रंजी का स्मरण करके जानकी जी तिनके की आड़ ( परदा ) करके कहने लगी ।। 3 ।।

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ।। 4 ।।

भावार्थः- हे दशमुख ! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है ? जानकी जी फिर कहती है- तू ( अपने लिए भी ) ऐसा ही मन मे समझ ले । रे दुष्ट ! तुझे श्री रघुवीर के बाण की खबर नही है ।। 4 ।।

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ।। 5 ।।

भावार्थः- रे पापी ! तू मुझे सूने मे हर लाया है । रे अधम ! निर्लज्ज ! तुझे लज्जा नही आती ?  ।। 5 ।।

दोहा – 9

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ।।9।।

भावार्थः- अपने को जुगनू के समान और रामचंद्रजी को सूर्य के समान सुनकर और सीताजी के कठोर वचनो को सुनकर रावण तलवार निकालकर बड़े गुस्से से आकर बोला ।। 9 ।।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी ।। 1 ।।

भावार्थः- सीता ! तूने मेरा अपमान किया है । मै तेरा सिर इस कठोर कृपाण से काट डालूँगा । नही तो ( अब भी ) जल्दी मेरी बात मान ले । हे सुमुखि ! नही तो जीवन से हाथ धोना पड़ेगा ।। 1 ।।

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।

सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ।। 2 ।।

भावार्थः- ( सीता जी ने कहा – ) हे दशग्रीव ! प्रभु की भुजा जो श्याम कलम की माला के समान सुंदर और हाथी की सूँड के समान ( पुष्ट तथा विशाल ) है , या तो वह भुजा ही मेरे कंठ मे पड़ेगी या तेरी भयानक तलवार ही । रे शठ ! सुन , यही मेरा सच्चा प्रण है ।। 2 ।।

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।

सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा ।। 3 ।।

भावार्थः-  सीता जी कहती है – हे चन्द्रहास ( तलवार ) ! श्री रघुनाथ जी के विरह कि अग्नि से उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलन को तू हर ले , हे तलवार ! तू शीतल,  तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है ( अर्थात् तेरी धारा ठंडी और तेज है ), तू मेरे दुःख के बोझ को हर ले ।। 3 ।।

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ।। 4 ।।

भावार्थः- सीताजी के ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा । तब मय दानव की पुत्री मन्दोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया । तब रावण ने सब दासियो को बुलाकर कहा कि जाकर सीता को बहुत प्रकार से भय दिखलाओ ।। 4 ।।

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ।। 5 ।।

भावार्थः- यदि महीने भर मे यह कहा न माने तो मै इसे तलवार निकालकर मार डालूँगा ।। 5 ।।

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ।। 10 ।।

भावार्थः- ( यो कहकर ) रावण महल चला गया । यहाँ राक्षसियो के समूह बहुत से बुरे रूप धरकर सीता जी को भय दिखलाने लगे ।। 10 ।।

चौपाई –

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना ।। 1 ।।

भावार्थः- उनमे एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी । उसकी सबो को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा-सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो ।। 1 ।।

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ।। 2 ।।

भावार्थः- स्वप्न ( मैने देखा कि ) एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसो की सारी सेना मार डाली गई । रावण नंगा है और गदहे पर सवार है । उसके सिर मुँडे हुए है, बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।। 2 ।।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ।। 3 ।।

भावार्थः- इस प्रकार से वह दक्षिण ( यमपुरी की ) दिशा को जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने पाई है । नगर मे श्री रामचन्द्र जी की दुहाई फिर गई । तब प्रभु ने सीता जी को बुला भेजा ।। 3 ।।

यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं ।। 4 ।।

भावार्थः- मैं पुकारकर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकीजी के चरणों पर गिर पड़ीं॥4॥

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